नयी दिल्ली। नीतू ने 2012 में जब पहली बार मुक्केबाजी के ग्लव्स उठाए तो यह उनके गांव में गहरी जड़ें जमा चुकी लड़कियों को ज्यादा बाहर नहीं निकलने देने की मानसिकता और उनके पिता के जज्बे का मुकाबला था जिसमें यह युवा मुक्केबाज अंत में विजयी रही।
यूरोप के सबसे प्रतिष्ठित और पुराने टूर्नामेंट 73वें स्ट्रैंड्जा मेमोरियल में पदार्पण करते हुए स्वर्ण पदक जीतने के बाद 48 किग्रा वर्ग में हिस्सा लेने वाली नीतू ने रविवार को बुल्गारिया के सोफिया से पीटीआई से कहा, ”हमारे गांव में लड़कियों का काफी ज्यादा घर से बाहर निकलना या महत्वाकांक्षी होना अच्छा नहीं माना जाता। इसलिए हां, जब मैंने शुरुआत की तो काफी कुछ कहा गया।
इस युवा मुक्केबाज ने कहा कि कई चुनौतियों के बावजूद उनके पिता ने मुक्केबाजी में सपने साकार करने के लिए उनकी हौसलाअफजाई की।
नीतू के पिता जय भगवान अपनी बेटी के करियर को लेकर इतने अधिक प्रतिबद्ध थे कि उन्होंने अपनी नौकरी को दांव पर लगा दिया और उधार लेकर अपने परिवार का गुजारा किया जिससे कि बेटी के करियर के शुरुआती वर्षों में हमेशा उसके साथ रह सकें।
अब उन्हें इसका नतीजा मिल रहा है जो काफी सुखद है। रविवार को 48 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली दो बार की पूर्व युवा विश्व चैंपियन नीतू भारतीय मुक्केबाजी की नर्सरी माने जाने वाले भिवानी से लगभग 16 किमी दूर पली बढ़ी।
भिवानी ने भारत को उसके कुछ सबसे सफल मुक्केबाज दिए हैं जिनमें ओलंपिक कांस्य पदक विजेता विजेंदर सिह भी शामिल हैं।
इक्कीस साल की नीतू ने कहा, ”उस समय घर में रहने के लिए समाज का दबाव था। 2००8 में विजेंदर भैया को बीजिग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतते हुए देखने के बाद मैं मुक्केबाज बनना चाहती थी।
उन्होंने कहा, ”2012 में मैंने फैसला किया कि मैं अपने लिए यही चाहती हूं और मेरे पिता ने फैसला किया कि वह मेरी मदद करने के लिए जो कर सकते हैं वह करेंगे।
नीतू ने कहा, ”इसलिए वह लगभग चार साल तक राज्य सरकार की अपनी नौकरी से बिना वेतन छुट्टी पर चले गए और रोज मुझे ट्रेनिग के लिए ले जाते थे।
एशियाई युवा चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक सहित आयु वर्ग के अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में नीतू के शानदार प्रदर्शन के बाद उनके पिता दोबारा अपने काम पर चले गए।
नीतू ने कहा, ”लेकिन जब कोविड-19 महामारी आई और राष्ट्रीय शिविर बंद हो गए तो वह दोबारा मुझे ट्रेनिग के लिए भिवानी मुक्केबाजी क्लब ले जाने लगे। वह मेरे साथ सड़क पर दौड़ते हैं। उन्होंने हमेशा मेरा मनोबल बढ़ाए रखा।
नीतू अपने संयुक्त परिवार से निकलने वाली पहली खिलाड़ी हैं। उन्होंने गर्व से कहा, ”अब मेरे छोटे भाई अक्षित ने निशानेबाजी शुरू की है। इसलिए वह दूसरा है।
नीतू को अपने घरवालों का पूरा साथ मिला। उन्होंने कहा, ”मेरे ताऊजी किसान हैं और जब मेरे पिता किसी कारण से मेरे साथ नहीं होते थे तो वह मुझे ट्रेनिग के लिए भिवानी क्लब ले जाते। मेरे पिता को घर चलाने के लिए उधार लेना पड़ा, यह सिर्फ मुझे कुछ बनाने के लिए किया।
उन्होंने कहा, ”मेरी मां को डर लगता था कि चोटों से मेरा चेहरा खराब हो जाएगा। लेकिन फिर भी वह मेरा समर्थन करती थी।
नीतू भी अपने घरवालों के भरोसे पर खरी उतरी और स्ट्रैंड्जा टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीतने वाली सिर्फ तीसरी भारतीय महिला मुक्केबाज बनीं।
नीतू की नजरें अब सात से नौ मार्च तक होने वाले विश्व चैंपियनशिप के ट्रायल और फिर 11 से 13 मार्च तक होने वाले एशियाई खेलों के ट्रायल पर टिकी हैं।
