संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र की उप महासचिव अमीना मोहम्मद महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों को बढ़ावा देने वाले एक प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख के रूप में मंगलवार को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पहुंची। तालिबान द्बारा महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ जारी किए हालिया फतवों के मद्देनजर यह प्रतिनिधिमंडल काबुल पहुंचा है।

संयुक्त राष्ट्र के उप प्रवक्ता फरहान हक ने बताया कि नाइजीरिया की पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं मुस्लिम नेता अमीना मोहम्मद के साथ लैंगिक समानता व महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ‘यूएन वीमेन की कार्यकारी निदेशक सीमा बहौस और राजनीतिक मामलों के सहायक महासचिव खालिद खियारी भी उनके साथ काबुल पहुंचे। हक ने कहा कि सुरक्षा कारणों के चलते वह उनके कार्यक्रम या बैठकों के बारे में जानकारी नहीं दे सकते।

प्रवक्ता ने कहा, ”संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, सतत विकास को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के प्रयास के तहत अफगानिस्तान की स्थिति पर चर्चा करने के लिए खाड़ी, एशिया और यूरोप में उच्च स्तरीय परामर्श की एक श्रृंखला शुरू की है। उन्होंने बताया कि प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने इस्लामी सहयोग संगठन के 57 सदस्य देशों, इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक, तुर्कीये की राजधानी अंकारा तथा पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अफगानिस्तान की महिलाओं के समूहों और कतर की राजधानी दोहा स्थित अफगानिस्तान के राजदूतों तथा विशेष दूतों के एक समूह से मुलाकात की।

हक ने कहा, ” इन यात्राओं के दौरान, देशों व साझेदारों ने एक स्थायी समाधान का मार्ग तलाशने के साथ-साथ जिदगियां बचाने वाली सहायता प्रदान करने में संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचाना और स्थिति की गंभीरता को दर्शाने के लिए प्रयास तेज करने का आह्वान किया। सहायता समूहों को महिलाओं को रोजगार देने से रोकने वाला तालिबान का 24 दिसंबर का आदेश उन माध्यमों को पंगु बना रहा है, जो लाखों अफगानिस्तानियों को जीवित रखने के लिए हैं। यह देश भर में जारी मानवीय सेवाओं के लिए भी खतरा हैं।

प्रतिबंध से हजारों महिलाएं जो युद्ध-पीड़ित देश भर में ऐसे संगठनों के लिए काम करती हैं, उन्हें वित्तीय परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि उनसे होने वाली आय उनके घर चलाने के लिए बेहद जरूरी है। इससे पहले तालिबान ने लड़कियों के माध्यमिक विद्यालयों में जाने और महिलाओं के विश्वविद्यालयों में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उनके विदेश यात्रा करने और देश के भीतर आने-जाने पर भी प्रतिबंध है।

अफगानिस्तान में 20 साल बाद अमेरिका और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) बलों की अराजक वापसी के बाद अगस्त 2021 में तालिबान ने फिर से सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। उसने 1996 से 2001 तक देश पर अपने पहले शासन के दौरान उठाए कदमों को दोहराना शुरू कर दिया है और धीरे-धीरे इस्लामी कानून या शरिया को फिर से लागू कर रहा है, जिससे महिलाओं को स्कूलों, नौकरियों और सहायता कार्यों से बाहर कर उन्हें घर की चार दीवारी में सीमित कर दिया गया है।

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